जार की निरंकुशता कहाँ तक रूसी क्रांति के लिए उत्तरदायी थी

जार की निरंकुशता कहाँ तक रूसी क्रांति के लिए उत्तरदायी थी ?

जार की निरंकुशता एवं अयोग्य शासन:— 1917 से रूस में रोमनोव-राजवंश का शासन था । उस समय रूस के सम्राट को ‘जार’ कहा जाता था । जार अलेक्जेंडर प्रथम के समय से हीं स्वेच्छाचारी शासन एवं दैवी अधिकार के सिद्धांत में वे विश्वास करते थे । इसने कुछ उदारता की नीति अपनाने का प्रयास भी किया, किन्तु पोलैंड के विद्रोह एवं अन्य बाह्य प्रभावों के कारण उसने पुन: प्रतिक्रियावादी नीति अपना ली । जार अलेक्जेण्डर द्वितीय ने भी उदारवादी नीति अपनाते हुए कृषक दासों की मुक्ति एवं स्थानीय स्वशासन संबंधी सुधार किये, किन्तु सामंतों के विरोध के कारण उसे भी पुन: प्रतिक्रियावादी नीति अपनानी पड़ी । इसके उत्तराधिकारी जार अलेक्जेण्डर तृतीय ने कठोर एवं दमनात्मक नीति का पालन किया । जार निकोलस-II जिसके शासनकाल में क्रांति हुई थी, इसने भी इसी नीति का पालन किया, किन्तु 1905 की क्रांति के फलस्वरूप उसे सुधारवादियों को संतुष्ट करने के लिए ‘ड्यूमा’ (रूसी संसद) का निर्वाचन कराना पड़ा । ‘ड्यूमा’ को भी उसने जनता की प्रतिनिधि सभा के वास्तविक अधिकारी होने से वंचित रखा । जार निकोलस-II की पत्नी भी घोर प्रतिक्रियावादी औरत थी । वह रासपुतीन नामक पथभ्रष्ट पादरी के चंगुल में फँस गयी थी । उस समय रासपुतीन की इच्छा ही कानून थी । वह नियुक्तियों, पदोन्नतियों तथा शासन के अन्य कार्यों में हस्तक्षेप करता था । 1916 में विरोधियों ने रासपुतीन की हत्या कर दी । जार ने जो अफसरशाही बनायी थी, वह अस्थिर, भ्रष्ट और अकुशल थी । अत: गलत सलाहकारों के कारण जार की स्वेच्छाचारिता बढ़ती गई और जनता की स्थिति लगातार दयनीय होती चली गई ।

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