स्वराज्य पार्टी की स्थापना एवं उद्देश्य की विवेचना करें

स्वराज्य पार्टी की स्थापना एवं उद्देश्य की विवेचना करें

महात्मा गांधी अचानक असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिये जाने से कांग्रेस के एक वर्ग में घोर निराशा और असंतोष फैल गया । देशबंधु चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू द्वारा सशक्त नीति के अपनाए जाने पर बल देने लगे । इनका विचार था कि कांग्रेस को असेंबली के बहिष्कार की नीति त्याग देनी चाहिए, कौंसिलों में प्रवेश कर सरकारी नीतियों का विरोध करना चाहिए तथा सरकार विरोधी जनमत तैयार करना चाहिए । यही वर्ग कांग्रेस का ‘परिवर्त्तनवादी दल’ कहा जाने लगा । 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में कौंसिल में प्रवेश के प्रश्न पर मतदान हुआ जिसमें ‘परिवर्त्तनवादी’ पराजित हुए । इसके बाद 1923 ई. में देशबंधु चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने इलाहाबाद में एक नवीन ‘स्वराज्य पार्टी’ की स्थापना की । स्वराज्य पार्टी का प्रथम सम्मेलन इलाहाबाद में 1923 में हुआ जिसमें देशबंधु चित्तरंजन दास इसके अध्यक्ष और मोतीलाल नेहरू इसके सचिव बने । इस दल ने कांग्रेस के अंदर रहकर अपनी अलग नीतियाँ चलाने का निश्चय किया ।

स्वराजियों का भी उद्देश्य स्वराज्य की प्राप्ति ही था, लेकिन इसे प्राप्त करने का उनका तरीका अलग था । इसके सदस्य चाहते थे कि केन्द्रीय और प्रांतीय विधानसभाओं में प्रवेश कर वे सरकार पर दबाव डालें कि वह राष्ट्रीय माँगों को एक निश्चित अवधि के अंदर पूरा करें । सरकार अगर ऐसा नहीं करती है तो विधानमंडलों के जरिए शासन करना असंभव कर दिया जाए । इसके सदस्य ने सरकारी पद स्वीकार नहीं करने, नगरपालिका चुनाव में भाग नहीं लेने की प्रतिज्ञा की । साथ ही, इसने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और कांग्रेस के रचनात्मक कार्यों में सहयोग देने का भी निर्णय लिया ।

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